पाठ्यक्रम: GS2/सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप; GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- हाल ही में सरकार ने मसौदा SHANTI नियम, 2026 जारी किए हैं, जिनमें परमाणु ऊर्जा उत्पादन के विस्तार और निजी क्षेत्र की भागीदारी की योजनाओं के बीच परमाणु संचालक की देयता, बीमा तथा वित्तीय सुरक्षा से संबंधित विस्तृत मानदंड प्रस्तावित किए गए हैं।
मसौदा SHANTI नियम, 2026 के बारे में
- मसौदा SHANTI नियम, 2026, SHANTI अधिनियम, 2025 के अंतर्गत परमाणु दायित्व संबंधी ढाँचे को क्रियान्वित करने तथा भारत के परमाणु क्षेत्र के विस्तार और विविधीकरण के लिए अधिक स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था प्रदान करने का प्रयास करते हैं।
- इन नियमों में कठोर संचालक दायित्व, अनिवार्य वित्तीय संरक्षण तथा पूरे जीवन-चक्र के लिए वित्तीय योजना के साथ-साथ परमाणु प्रौद्योगिकी के व्यापक अनुप्रयोगों से संबंधित प्रावधानों को समाहित किया गया है।
मसौदा नियमों के प्रमुख प्रावधान
- कठोर एवं दोष-रहित दायित्व: परमाणु संस्थापन के संचालक परमाणु क्षति के लिए कठोर रूप से उत्तरदायी होंगे और इसके लिए दोष सिद्ध करना आवश्यक नहीं होगा।
- दायित्व में परमाणु सामग्री के परिवहन के दौरान होने वाली क्षति भी शामिल होगी।
- अनिवार्य वित्तीय संरक्षण: संचालकों के लिए बीमा पॉलिसी, वित्तीय सुरक्षा या दोनों के संयोजन को बनाए रखना अनिवार्य होगा।
- वित्तीय सुरक्षा अपरिवर्तनीय होनी चाहिए और तब तक वैध रहनी चाहिए, जब तक रिएक्टर से हटाए जाने के बाद समस्त प्रयुक्त ईंधन को प्रयुक्त-ईंधन भंडारण पूल से बाहर नहीं निकाल दिया जाता।
- यदि शेयर, बॉण्ड या अन्य वित्तीय साधनों का उपयोग किया जाता है, तो इन्हें केंद्र सरकार के पक्ष में गिरवी रखा जाएगा तथा 1:1.33 का सुरक्षा मार्जिन बनाए रखना होगा।
- किसी भी कमी की स्थिति में अतिरिक्त बीमा या वित्तीय सुरक्षा के माध्यम से उसे तत्काल पूरा करना होगा।
- परमाणु प्रौद्योगिकी के व्यापक अनुप्रयोग: यह ढाँचा विद्युत उत्पादन से आगे परमाणु प्रौद्योगिकी के उपयोग की परिकल्पना करता है, जिसमें कैप्टिव विद्युत उत्पादन और प्रक्रिया-ताप, हाइड्रोजन उत्पादन, चिकित्सा समस्थानिक, शिक्षा, प्रशिक्षण तथा अनुसंधान शामिल हैं।
- कठिन-से-उत्सर्जन-न्यून क्षेत्रों के उद्योगों के लिए परमाणु कैप्टिव विद्युत उत्पादन।
- डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर विनिर्माण, क्वांटम प्रौद्योगिकी, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग तथा AI-सक्षम प्रौद्योगिकियों जैसे उभरते अनुप्रयोग।
- जीवन-चक्र आधारित वित्तीय योजना: लाइसेंस प्राप्त संस्थापन के लिए नागरिक दायित्व, परिचालन लागत, प्रयुक्त ईंधन एवं रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन, संस्थापन को निष्क्रिय करने तथा स्थल के पुनर्स्थापन के लिए वित्तीय व्यवस्थाएँ करना आवश्यक होगा।
- सरकार के स्वामित्व वाले संस्थापन: निर्दिष्ट केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले संस्थापनों को बीमा या अन्य वित्तीय सुरक्षा प्राप्त करने से छूट दी जा सकती है। ऐसी स्थिति में संबंधित क्षति के लिए केंद्र सरकार दायित्व वहन करेगी।
- आवधिक समीक्षा: एक विशेषज्ञ समूह प्रत्येक पाँच वर्ष में अधिकतम नागरिक दायित्व सीमा की समीक्षा करेगा। इसमें परमाणु विज्ञान, अभियांत्रिकी, बीमांकिक विज्ञान, बीमा, विधि तथा जनहित के क्षेत्रों के विशेषज्ञों का अनुभव लिया जाएगा।

संबंधित चिंताएँ एवं मुद्दे
- मुआवजे की पर्याप्तता: दायित्व की सीमाएँ और वित्तीय सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएँ ऐसी होनी चाहिए कि परियोजनाओं को वित्तीय रूप से अव्यवहार्य बनाए बिना प्रभावित पक्षों को सार्थक मुआवजा मिल सके।
- निजी क्षेत्र का जोखिम: बीमा की उच्च लागत और दीर्घकालिक परमाणु जोखिम निजी निवेश को प्रभावित कर सकते हैं।
- नैतिक जोखिम: कुछ संस्थापनों के लिए सरकार द्वारा समर्थित दायित्व व्यवस्था से सुरक्षा के प्रति प्रोत्साहन कमजोर नहीं होना चाहिए।
- अपशिष्ट एवं संस्थापन-निष्क्रियकरण: दीर्घकालिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन के लिए स्थिर संस्थागत व्यवस्था, पर्याप्त वित्तपोषण तथा तकनीकी क्षमता आवश्यक है।
- नियामकीय स्वतंत्रता: निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के साथ एक सुदृढ़ , पारदर्शी और तकनीकी रूप से सक्षम परमाणु नियामक की आवश्यकता अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
- जनविश्वास एवं सुरक्षा: परमाणु ऊर्जा का विस्तार कठोर सुरक्षा मानकों, आपातकालीन तैयारी तथा पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों पर आधारित रहना चाहिए।
भारत का परमाणु ऊर्जा परिदृश्य
- परमाणु ऊर्जा भारत की स्वच्छ-ऊर्जा रणनीति का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के साथ विश्वसनीय और कम-कार्बन वाली बेसलोड विद्युत उपलब्ध कराती है।
- भारत ने अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा-परिवर्तन रणनीति के अंतर्गत 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
- परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और उसके सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने ऐतिहासिक रूप से भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
- भारत स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ा रहा है, जिनमें दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWRs) तथा लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) का विकास शामिल है।
- परमाणु प्रौद्योगिकी का उपयोग विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त स्वास्थ्य सेवा, कृषि, खाद्य संरक्षण, उद्योग, अनुसंधान तथा समस्थानिक उत्पादन जैसे क्षेत्रों में भी किया जाता है।
- सरकार पूंजी, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण क्षमताओं को एकत्रित करने तथा परमाणु ऊर्जा की तैनाती में तीव्रता लाने के लिए निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी की दिशा में प्रयास कर रही है।
- परमाणु ऊर्जा के विस्तार के लिए परमाणु सुरक्षा, रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन, प्रयुक्त ईंधन प्रबंधन, संस्थापन-निष्क्रियकरण तथा आपातकालीन तैयारी पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
SHANTI अधिनियम, 2025
- यह भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के आगामी चरण के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है।
- यह परमाणु विद्युत उत्पादन में व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाने का प्रयास करता है, जबकि परमाणु सुरक्षा और संरक्षा पर सुदृढ़ सरकारी निगरानी बनाए रखता है।
- अधिनियम परमाणु संस्थापनों एवं गतिविधियों के लाइसेंसिंग के लिए एक ढाँचा प्रदान करता है तथा संचालकों की जिम्मेदारियाँ निर्धारित करता है।
- इसका उद्देश्य परमाणु क्षेत्र में निवेश के लिए अधिक कानूनी एवं नियामकीय निश्चितता सुनिश्चित करना है।
- यह ढाँचा नागरिक परमाणु दायित्व से संबंधित है, जिसमें परमाणु क्षति के लिए मुआवजे से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।
- इसमें परमाणु दायित्व संबंधी दायित्वों को पूरा करने के लिए वित्तीय सुरक्षा/बीमा की व्यवस्थाओं की परिकल्पना की गई है।
- यह कानून लागू नियामकीय ढाँचे के अधीन गैर-विद्युत अनुप्रयोगों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग को भी समर्थन देता है।
- सुरक्षा, संरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा सुरक्षा-उपाय नियामकीय व्यवस्था के केंद्रीय तत्व बने हुए हैं।
- इस अधिनियम का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु संबंधी लक्ष्यों, जनसुरक्षा तथा रणनीतिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए भारत के परमाणु ऊर्जा विस्तार को सुगम बनाना है।
आगे की राह: दायित्व व्यवस्था को सुदृढ़ करना और निजी भागीदारी को सक्षम बनाना
- भारत को ऐसी जोखिम-संवेदी परमाणु दायित्व व्यवस्था अपनानी चाहिए, जो निवेशकों के लिए निश्चितता और जनता के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करे। इसके लिए आवश्यक है:
- स्पष्ट और पूर्वानुमेय दायित्व सीमाएँ तथा बीमा तंत्र।
- स्वतंत्र और पर्याप्त संसाधनों से युक्त परमाणु सुरक्षा नियामक।
- अपशिष्ट प्रबंधन तथा संस्थापन-निष्क्रियकरण के लिए पृथक एवं सुरक्षित निधियाँ।
- पारदर्शी आपातकालीन प्रतिक्रिया तथा सार्वजनिक सूचना-प्रकटीकरण तंत्र।
- आपूर्तिकर्ताओं और संचालकों की सुरक्षा संबंधी सुदृढ़ जवाबदेही।
- तकनीकी एवं बीमांकिक साक्ष्यों के आधार पर दायित्व संबंधी मानदंडों की आवधिक समीक्षा।
- परमाणु विनिर्माण, बीमा, सुरक्षा प्रौद्योगिकी तथा अपशिष्ट प्रबंधन में घरेलू क्षमता का विस्तार।
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संक्षिप्त समाचार 18-08-2026